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नदियों के कमजोर बंधों को मरम्मत की दरकार

रेन कट और रैट होल को भरने में जिम्मेदारों ने की खानापूरी

महराजगंज (न्यूज पैच ब्यूरो)। मानसून से पहले ही बारिश शुरू हो चुकी है। बीते दिनों अच्छी बारिश हुई। इसका असर बंधों पर दिख रहा है। जिले में नदियों के किनारे बने तटबंध के मरम्मत को लेकर जिम्मेदार महज खानापूरी कर खामोश हो गए। फाइलों में सब कुछ अपडेट कर रिपोर्ट तैयार कर ली गई है, जबकि हकीकत में रेन कट व रैट होल ठीक से भरे नहीं गए हैं। कहीं कहीं पर बंधों पर बने रास्ते गड्ढायुक्त हैं। किनारों पर हुए कटान को रोकने के लिए भी मुकम्मल इंतजाम नहीं हुए हैं। आलम यही रहा तो आने वाले दिनों में लारपवाही का खामियाजा बंधों के किनारे बसे लोगों को उठाना पड़ सकता है।

आराजी जगपुर बाध की हकीकत बताती तस्वीर

जिले में बंधों के रखरखाव की जिम्मेदारी सिचाई विभाग की है। पनियरा क्षेत्र में जर्दी डोमरा बांध की पड़ताल में करीब 20 जगहों पर कट मिला है। कहीं कहीं तो बारिश के कटान भी नहीं भरा गया है। बंधों पर बने रास्ते भी ठीक हालत में नहीं हैं। अगर तेज बारिश हो जाय तो रास्ते से गुजरना मुश्किल हो जाएगा। चेहरी बांध की बात करें तो इसमें ज्यादातर हिस्से ठीक हालत में हैं, लेकिन आबादी क्षेत्र से आगे बढ़ने पर बंधे की हालत ठीक नहीं है। बंधे पर करीब चार किमी गुजरने पर 10 से अधिक स्थानों पर छोटे छोटे गड्ढे बने हैं। चेहरी के मोहन कहते हैं कि सिचाई विभाग को हर साल बाढ़ आने का इंतजार रहता है। क्योंकि, जैसे तैसे काम कराने के बाद जिम्मेदार खामोश हो जाते हैं। बाढ़ आने के बाद उनकी कथनी करनी पर पर्दा पड़ जाता है। समय के पहले ठीक से काम नहीं कराया जाता है। चहेरी के दिनेश भी तीखी प्रतिकिया व्यक्त करते हुए जिम्मेदारों के कार्य प्रणाली की आलोचना की।

उन्होंने कहा कि बाढ़ में तो जनता परेशान होती है, अधिकारी नहीं। लोगाें की समस्याओं से जिम्मेदारों को कोई लेना देना नहीं रह गया है। बारिश तेज होने के बाद नदी में जल स्तर बढ़ता है तो डर लगता है। दो साल पहले तो कई दिनों तक बंधों पर शरण लेनी पड़ी थी। इसी तरह से लक्ष्मीपुर क्षेत्र के बंधों की हालत ठीक नहीं है। क्षेत्र के लोगों के मुताबिक यहां भी मरम्मत ठीक से नहीं हुए हैं। जिम्मेदारों की ओर से खानापूरी कर दायित्व की इतिश्री कर दी गई। नौतनवा क्षेत्र के बघेला नाले को लेकर भी जिम्मेदार कायदे कानून का सहारा लेकर बचते रहते हैं। विभाग इसे नदी नहीं मानता है, जबकि सबसे अधिक तबाही इससे मचती है। अगर बघेला उफनाती है तो क्षेत्र की करीब 60 हजार की आबादी सीधे प्रभावित होती है। क्षेत्र में मोहन यादव ने बताया कि तीन साल पहले बाढ़ में गांव के लोग छतों पर रात गुजारने को विवश रहे। उस वक्त समस्या झेलनी पड़ी थी। पानी की दबाव जब भी बढ़ता है तो कमजोर किनारे दरक जाते हैं। इससे काफी नुकसान होता है।

इसी तरह से महाव नाले पर भी हर हाल करोड़ों पानी बह जाता है। क्षेत्र की 20 गांव से अधिक की आबादी परेशान होती है। हर साल पानी का दबाव बढ़ने पर किनारे दरक जाते हैं। इसके बाद अधिकारी मरम्मत का खेल शुरू करते हैं। इसमें मरम्मत के नाम पर करोड़ों का खेल कर हर साल जिम्मेदार अपनी तिजोरी भर लेते है, जबकि जनता के हिस्से मुसिबत हाथ लगती है।

सिंचाई खंड दो अधिशासी अभियंता राजीव कपिल ने बताया की जिले में बाढ़ से बचाव को लेकर तैयारी पूरी है। सभी बंधें सुरक्षित हैं। सभी कट भरे जा चुके हैं। बंधों की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारों को निर्देशित किया जा चुका है। इसमें लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

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