प्रोजेक्ट पहचान के तहत क्लस्टर स्तरीय प्रशिक्षण शुरू, 0 से 6 वर्ष के बच्चों में विकासात्मक बाधाओं की होगी समय रहते पहचान

महराजगंज।(न्यूज पैच)। जनपद में 0 से 6 वर्ष तक के बच्चों के समग्र विकास एवं प्रारंभिक अवस्था में विकासात्मक बाधाओं और दिव्यांगताओं की समय रहते पहचान सुनिश्चित करने के उद्देश्य से संचालित “प्रोजेक्ट पहचान” के अंतर्गत क्लस्टर स्तर पर प्रशिक्षण अभियान का शुभारंभ हो गया है। इस अभिनव पहल के तहत जिले के 222 क्लस्टरों में आशा, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों एवं एएनएम को प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि गांव स्तर पर बच्चों में संभावित समस्याओं की समय रहते पहचान कर उनका उपचार एवं पुनर्वास सुनिश्चित किया जा सके।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को बच्चों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं व्यवहारिक विकास के विभिन्न चरणों की विस्तृत जानकारी दी जा रही है। साथ ही प्रारंभिक संकेतों के आधार पर विकासात्मक बाधाओं, बीमारियों एवं दिव्यांगता की पहचान करने, अभिभावकों की काउंसलिंग, स्क्रीनिंग प्रक्रिया, डेटा संकलन तथा संदिग्ध बच्चों को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने की कार्यप्रणाली भी समझाई जा रही है।
यह प्रशिक्षण संबंधित क्षेत्र के सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) एवं एएनएम द्वारा संचालित किया जा रहा है। प्रत्येक क्लस्टर में प्रशिक्षण के समन्वय के लिए पंचायत सचिवों को क्लस्टर नोडल अधिकारी बनाया गया है, जबकि विभिन्न विभागों के ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों को पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
अभियान का उद्देश्य बच्चों में सीखने, सुनने, देखने, बोलने, चलने-फिरने, मानसिक विकास अथवा अन्य विकासात्मक समस्याओं की शुरुआती अवस्था में पहचान कर समय पर चिकित्सकीय उपचार एवं पुनर्वास उपलब्ध कराना है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र में पहचान और हस्तक्षेप से अधिकांश समस्याओं का प्रभावी समाधान संभव है तथा बच्चों को सामान्य जीवन की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है।
गौरतलब है कि जिलाधिकारी गौरव सिंह सोगरवाल पहले ही इस महत्वाकांक्षी अभियान की रूपरेखा तय करने के लिए जिला स्तरीय अधिकारियों, खंड विकास अधिकारियों, चिकित्सा अधीक्षकों एवं सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक कर चुके हैं। इसके तहत 31 जुलाई को सभी विकास खंडों में कार्यशालाएं आयोजित कर अभियान की रणनीति एवं विभागीय जिम्मेदारियों पर विस्तार से चर्चा की गई थी।
इस अभियान में बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग को नोडल विभाग बनाया गया है। स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्राम्य विकास एवं पंचायतीराज विभाग सहित अन्य संबंधित विभाग समन्वित रूप से कार्य कर रहे हैं, ताकि कोई भी जरूरतमंद बच्चा इस अभियान से वंचित न रह जाए।
अभियान के तहत आशा, आंगनबाड़ी कार्यकत्री एवं एएनएम गांव-गांव जाकर घर-घर बच्चों की स्क्रीनिंग करेंगी। 6, 12, 18, 24, 36, 48 और 60 माह की आयु के अनुसार निर्धारित विकासात्मक संकेतकों के आधार पर बच्चों का मूल्यांकन किया जाएगा। यदि किसी बच्चे में अपेक्षित विकास नहीं पाया जाता है तो उसे तत्काल चिकित्सकीय जांच, उपचार एवं पुनर्वास सेवाओं से जोड़ा जाएगा।
जिला प्रशासन के अनुसार प्रोजेक्ट पहचान का उद्देश्य केवल विकासात्मक बाधाओं की पहचान करना नहीं, बल्कि समय पर उपचार उपलब्ध कराकर संभावित दिव्यांगता की गंभीरता को कम करना, स्कूल ड्रॉपआउट की समस्या घटाना, सामाजिक उपेक्षा रोकना तथा बच्चों को आत्मनिर्भर एवं सक्षम नागरिक बनने का अवसर प्रदान करना भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रारंभिक पहचान और समय पर हस्तक्षेप से उपचार की सफलता की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। इसी सोच के साथ इस अभियान को जनभागीदारी आधारित मॉडल पर संचालित किया जा रहा है, ताकि प्रत्येक गांव तक स्वास्थ्य एवं बाल विकास सेवाओं की प्रभावी पहुंच सुनिश्चित हो सके।




