14 सितंबर को चंद्रमा-शुक्र की होगी बेहद नजदीकी खगोलीय युति
सूर्यास्त के बाद पश्चिमी आकाश में दिखेगी चमकीली जोड़ी, कुछ क्षेत्रों में शुक्र के चंद्रमा के पीछे छिपने का नजारा भी संभव

गोरखपुर।(न्यूज पैच)। आकाश-दर्शन में रुचि रखने वालों के लिए 14 सितंबर 2026 की शाम बेहद खास रहने वाली है। वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला, गोरखपुर के खगोलविद एवं एस्ट्रोनॉमी एजुकेटर अमर पाल सिंह के अनुसार, इस दिन सूर्यास्त के बाद पश्चिमी से दक्षिण-पश्चिमी आकाश में चंद्रमा और शुक्र ग्रह एक-दूसरे के बेहद करीब दिखाई देंगे।
खगोलीय गणना के अनुसार दोनों के बीच न्यूनतम कोणीय दूरी करीब 28.8 आर्कमिनट यानी 0.48 डिग्री रहेगी। इतनी कम दूरी के कारण चंद्रमा और शुक्र कम शक्ति वाली दूरबीन या छोटे टेलीस्कोप के एक ही दृश्य क्षेत्र में आ सकते हैं। हालांकि, इस नजारे को देखने के लिए किसी उपकरण की आवश्यकता नहीं होगी। शुक्र अपनी अत्यधिक चमक के कारण आसानी से नजर आएगा, जबकि चंद्रमा पतले बढ़ते अर्धचंद्र के रूप में दिखाई देगा।
सूर्यास्त के बाद करीब एक घंटे का बेहतरीन मौका
अमर पाल सिंह के मुताबिक दोनों खगोलीय पिंड सूर्यास्त के बाद पश्चिमी आकाश में दिखाई देंगे। करीब शाम 6:16 बजे वे दक्षिण-पश्चिमी क्षितिज से लगभग 16 डिग्री ऊपर रहेंगे और धीरे-धीरे क्षितिज की ओर नीचे जाते दिखाई देंगे। करीब 7:30 बजे के आसपास इनके अस्त होने की संभावना है। इसलिए साफ क्षितिज वाले स्थान से सूर्यास्त के तुरंत बाद का समय इस खगोलीय घटना के अवलोकन के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
इस दौरान चंद्रमा लगभग 15 प्रतिशत प्रकाशित होगा और उसका दृश्य परिमाण करीब -7.63 बताया गया है, जबकि शुक्र का दृश्य परिमाण करीब -4.73 रहेगा। दोनों कन्या तारामंडल की दिशा में दिखाई देंगे।
कुछ क्षेत्रों में होगा शुक्र का आच्छादन
इस खगोलीय घटना की एक और खास बात यह है कि दुनिया के कुछ हिस्सों में चंद्रमा शुक्र को कुछ समय के लिए पूरी तरह ढकता हुआ दिखाई दे सकता है। इसे लूनर ऑक्ल्टेशन ऑफ वीनस यानी चंद्रमा द्वारा शुक्र का आच्छादन कहा जाता है।
खगोलविद ने स्पष्ट किया कि यह चंद्र ग्रहण नहीं है। चंद्र ग्रहण में पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है, जबकि ऑक्ल्टेशन में चंद्रमा हमारी दृष्टि से किसी दूर स्थित खगोलीय पिंड को कुछ समय के लिए ढक देता है।
उन्होंने बताया कि 14 सितंबर की शुक्र-आच्छादन घटना का क्षेत्र एशिया, अफ्रीका, यूरोप और पश्चिमी रूस के कुछ हिस्सों तक सीमित रहेगा। भारत के सभी हिस्सों से आच्छादन दिखाई देना जरूरी नहीं है। भारत के बड़े हिस्से में मुख्य रूप से चंद्रमा और शुक्र की बेहद नजदीकी युति देखने को मिलेगी।
ऐपल्स, कंजंक्शन और ऑक्ल्टेशन में अंतर
अमर पाल सिंह के अनुसार, जब पृथ्वी से देखने पर दो खगोलीय पिंड आकाश में एक-दूसरे के बहुत करीब दिखाई देते हैं तो इसे ऐपल्स (Appulse) कहा जाता है। वहीं कंजंक्शन (Conjunction) एक अधिक तकनीकी खगोलीय स्थिति है, जिसमें दो पिंडों की निर्धारित आकाशीय निर्देशांक स्थिति, जैसे दायाँ आरोहण या संबंधित संदर्भ के अनुसार क्रांतिवृत्तीय देशांतर, समान या अत्यंत निकट होती है।
जब एक खगोलीय पिंड पृथ्वी से देखने पर दूसरे पिंड को हमारी दृष्टि से ढक देता है, तो उसे ऑक्ल्टेशन या आच्छादन कहा जाता है। इन घटनाओं में चंद्रमा की भूमिका अधिक रहती है, क्योंकि वह पृथ्वी के निकट होने के कारण आकाश में अपेक्षाकृत तेजी से अपना स्थान बदलता है।
कहां और कैसे देखें?
आकाश-दर्शकों को सूर्यास्त के बाद पश्चिम दिशा में नजर रखनी चाहिए। सबसे पहले चमकीले शुक्र ग्रह को खोजें। उसके पास ही पतला चंद्र-वर्धमान दिखाई देगा। भवनों, पेड़ों और पहाड़ियों से बाधित क्षितिज की बजाय खुले स्थान से इस दृश्य को देखना बेहतर रहेगा।
खगोलविद ने बताया कि चंद्रमा पृथ्वी के काफी निकट होने के कारण अलग-अलग स्थानों से उसकी आकाशीय स्थिति में थोड़ा अंतर दिखाई दे सकता है। इसे लंबन (Parallax) कहा जाता है। इसी कारण शुक्र के आच्छादन की दृश्यता पृथ्वी के हर स्थान से एक जैसी नहीं होती।
उन्होंने बताया कि भारत में चंद्रमा द्वारा शुक्र के आच्छादन की पिछली प्रमाणित दृश्य घटना 24 मार्च 2023 को हुई थी। हालांकि 14 सितंबर 2026 को भारत के बड़े हिस्से से चंद्रमा और शुक्र की नजदीकी युति देखने का अच्छा अवसर मिलेगा।
सूर्य की ओर दूरबीन न करें
अमर पाल सिंह ने आकाश-दर्शकों से विशेष सावधानी बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा कि सूर्य को सीधे दूरबीन, टेलीस्कोप या बिना प्रमाणित सोलर फिल्टर वाले किसी ऑप्टिकल उपकरण से नहीं देखना चाहिए। इससे आंखों को गंभीर नुकसान हो सकता है। सूर्यास्त के आसपास भी दूरबीन को सूर्य की दिशा में लगाते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।




