शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है चरित्र निर्माण : डॉक्टर इंद्र कुमार
शिक्षा, साहित्य, समाज और संस्कृति पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन, भारत-नेपाल के विद्वानों ने रखे विचार

आनंदनगर/महराजगंज।(न्यूज पैच)। लुंबिनी बुद्धिस्ट यूनिवर्सिटी एवं लाल बहादुर शास्त्री स्मारक पीजी कॉलेज, आनंदनगर के संयुक्त तत्वावधान में “शिक्षा, साहित्य, समाज और संस्कृति का वैश्विक विमर्श : चुनौतियां, अवसर एवं संभावनाएं” विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में शिक्षा, साहित्य, समाज और संस्कृति के विभिन्न आयामों पर गहन मंथन किया गया। संगोष्ठी में भारत और नेपाल के शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं विद्वानों ने भाग लेकर अपने विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए डॉ. इंद्र कुमार काफले ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण है। उन्होंने कहा कि चरित्र निर्माण तभी संभव है जब शिक्षा, साहित्य, समाज और संस्कृति एक-दूसरे के साथ समन्वित होकर कार्य करें। उन्होंने कहा कि ये चारों मानव सभ्यता के ऐसे स्तंभ हैं जिन पर विश्व की शांति, प्रगति और सतत विकास आधारित है।
डॉ. काफले ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि ज्ञान को केवल सूचना तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ा जाए। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के इस दौर में पूरी दुनिया एक वैश्विक गांव में बदल चुकी है और अंतरराष्ट्रीय सहयोग, डिजिटल तकनीक तथा ज्ञान के आदान-प्रदान ने नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं।
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु, सिद्धार्थनगर के कुलसचिव डॉ. अश्विनी कुमार शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का युग है। यदि हम तकनीकी रूप से दक्ष नहीं होंगे तो विकास की वैश्विक दौड़ में पीछे रह जाएंगे। उन्होंने मानव केंद्रित शिक्षा को बढ़ावा देने, बहुसांस्कृतिक संवाद को प्रोत्साहित करने, साहित्य को सशक्त बनाने तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए वैश्विक सहयोग विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
विशिष्ट वक्ता एवं ‘वाटर वूमेन’ के नाम से प्रसिद्ध शिप्रा पाठक ने पर्यावरणीय चुनौतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज मानव सभ्यता के सामने पर्यावरण संकट सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। उन्होंने कहा कि अंधाधुंध पेड़ों की कटाई, नदियों, तालाबों एवं जल स्रोतों के लगातार घटते अस्तित्व ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यदि पर्यावरण स्वस्थ नहीं रहेगा तो समाज और राष्ट्र का विकास भी प्रभावित होगा।
लाल बहादुर शास्त्री पीजी कॉलेज के प्रबंधक डॉ. बलराम भट्ट ने कहा कि समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं, बल्कि साझा मूल्यों, परंपराओं और संबंधों का जीवंत तंत्र है। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण और तकनीकी विकास के दौर में सामाजिक मूल्यों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
संगोष्ठी के संयोजक एवं कैंपस प्रमुख आचार्य दयानिधि ने शिक्षा, साहित्य, समाज और संस्कृति को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बताते हुए कहा कि ये सभी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं और किसी भी देश की पहचान तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लाल बहादुर शास्त्री स्मारक पीजी कॉलेज के प्राचार्य एवं संगोष्ठी संयोजक डॉ. राम पांडे ने सभी अतिथियों का परिचय कराते हुए उनका स्वागत एवं सम्मान किया। वहीं रामजी सहाय पीजी कॉलेज, रुद्रपुर (देवरिया) के प्राचार्य प्रो. बृजेश पांडे ने विषय प्रवर्तन प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का संचालन लुंबिनी बुद्धिस्ट यूनिवर्सिटी के डॉ. राजेंद्र ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन संगोष्ठी के सहसंयोजक एवं कालिंदी प्रकाशन समूह के निदेशक डॉ. अमित कुमार दुबे ‘शिवम’ ने किया।
संगोष्ठी में प्रो. अरविंद सिंह, प्रो. हरिशंकर सिंह, डॉ. कमल थापा, गजेंद्र गुप्ता, प्रो. जीतू गिरी, डॉ. के.आर. यादव, डॉ. देवेंद्र कुमार पाठक, डॉ. सरोज पांडे, डॉ. पूजा सिंह, चांदनी दुबे सहित भारत और नेपाल के अनेक आचार्य, सह-आचार्य, सहायक आचार्य, शोधार्थी एवं शिक्षाविद उपस्थित रहे।
दो दिवसीय संगोष्ठी के विभिन्न तकनीकी सत्रों में कुल 54 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए, जिनमें शिक्षा, साहित्य, समाज और संस्कृति से जुड़े समकालीन विषयों पर गंभीर विमर्श किया गया।




