आज रात सूर्य से सबसे अधिक दूरी पर होगी पृथ्वी, फिर भी नहीं घटेगी गर्मी; जानिए अपसौर का वैज्ञानिक रहस्य

महराजगंज।(न्यूज पैच)। अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में सोमवार की रात एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना घटित होने जा रही है। भारतीय समयानुसार रात 11 बजे पृथ्वी अपनी कक्षा में उस बिंदु पर पहुंचेगी, जहां वह पूरे वर्ष में सूर्य से सबसे अधिक दूरी पर होती है। इस खगोलीय स्थिति को ‘अपसौर (Aphelion)’ कहा जाता है। इस अवसर पर खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस घटना के वैज्ञानिक पहलुओं की विस्तृत जानकारी देते हुए लोगों से सोशल मीडिया पर फैलने वाली भ्रामक जानकारियों से बचने की अपील की है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा पूर्ण वृत्ताकार नहीं, बल्कि दीर्घवृत्ताकार (Elliptical) कक्षा में करती है। इसी कारण वर्ष में एक समय ऐसा आता है जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है, जिसे उपसौर (Perihelion) कहा जाता है, जबकि दूसरा समय वह होता है जब पृथ्वी सूर्य से सबसे अधिक दूर होती है, जिसे अपसौर (Aphelion) कहा जाता है। वर्ष 2026 में यह खगोलीय घटना 6 जुलाई को भारतीय समयानुसार रात 11 बजे घटित होगी।
उन्होंने बताया कि इस समय पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी लगभग 15 करोड़ 21 लाख किलोमीटर (152.1 मिलियन किमी) होगी, जबकि उपसौर के समय जनवरी में यह दूरी लगभग 14 करोड़ 71 लाख किलोमीटर (147.1 मिलियन किमी) रहती है। यानी दोनों स्थितियों के बीच करीब 50 लाख किलोमीटर का अंतर होता है, जो पृथ्वी और सूर्य की औसत दूरी का केवल लगभग 3.3 प्रतिशत है।
दूरी नहीं, पृथ्वी का झुकाव तय करता है मौसम
खगोलविद अमर पाल सिंह ने कहा कि आमतौर पर लोगों में यह भ्रम रहता है कि जब पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है तो पृथ्वी पर ठंड पड़नी चाहिए। जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। जुलाई के महीने में भारत सहित पूरे उत्तरी गोलार्ध में गर्मी और वर्षा का मौसम रहता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में सर्दी होती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ऋतुओं का निर्धारण सूर्य से दूरी नहीं, बल्कि पृथ्वी की धुरी के लगभग 23.5 डिग्री के झुकाव से होता है। जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर झुका रहता है, तब वहां सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ती हैं और दिन लंबे होते हैं, जिससे गर्मी का मौसम बनता है। वहीं दक्षिणी गोलार्ध में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने के कारण वहां सर्दी रहती है।
अपसौर पर पृथ्वी की गति भी हो जाती है धीमी
अमर पाल सिंह ने बताया कि जर्मन खगोलशास्त्री जोहान्स केपलर के दूसरे नियम के अनुसार ग्रह सूर्य के निकट होने पर तेज गति से चलते हैं और दूर होने पर उनकी गति कुछ कम हो जाती है। यही कारण है कि उपसौर के समय पृथ्वी की कक्षीय गति लगभग 30.29 किलोमीटर प्रति सेकंड होती है, जबकि अपसौर के समय यह घटकर लगभग 29.29 किलोमीटर प्रति सेकंड रह जाती है।
उन्होंने बताया कि इसी कारण उत्तरी गोलार्ध में गर्मियों की अवधि सर्दियों की तुलना में कुछ दिन अधिक लंबी होती है, क्योंकि पृथ्वी इस समय अपनी कक्षा में अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ती है।
सौर ऊर्जा में होती है मामूली कमी
खगोलविद ने बताया कि सूर्य से दूरी बढ़ने के कारण पृथ्वी तक पहुंचने वाली सौर ऊर्जा में लगभग 6 से 7 प्रतिशत की कमी अवश्य आती है, लेकिन यह कमी इतनी नहीं होती कि पृथ्वी के मौसम में कोई बड़ा परिवर्तन आ जाए। पृथ्वी की धुरी का झुकाव इस प्रभाव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भ्रमों से बचने की जरूरत
अमर पाल सिंह ने कहा कि सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि जुलाई में सूर्य से दूरी बढ़ने के कारण पृथ्वी ठंडी हो जाती है या सूर्य बहुत छोटा दिखाई देने लगता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये दोनों धारणाएं वैज्ञानिक रूप से गलत हैं। सूर्य का कोणीय आकार थोड़ा छोटा अवश्य दिखाई देता है, लेकिन यह परिवर्तन सामान्य आंखों से देख पाना लगभग असंभव है।
विद्यार्थियों के लिए सीखने का अवसर
उन्होंने कहा कि अपसौर केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि ग्रहों की गति, गुरुत्वाकर्षण, ऊर्जा वितरण और पृथ्वी की जलवायु को समझने का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह घटना विद्यार्थियों को न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत, केपलर के ग्रह गति नियमों तथा पृथ्वी–सूर्य प्रणाली की वैज्ञानिक संरचना को समझने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।
वैज्ञानिकों की नजर अंतरिक्ष पर लगातार
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि आधुनिक अंतरिक्ष एजेंसियां जैसे नासा (NASA), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) और इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन (IAU) लगातार पृथ्वी की कक्षा और खगोलीय घटनाओं का अध्ययन कर रही हैं। अपसौर जैसी घटनाएं न केवल वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यह भी बताती हैं कि ब्रह्मांड में होने वाली प्रत्येक घटना गणित, भौतिकी और गुरुत्वाकर्षण के सटीक नियमों के अनुसार संचालित होती है।
उन्होंने कहा कि 6 जुलाई 2026 का अपसौर एक बार फिर यह सिद्ध करता है कि पृथ्वी पर ऋतुओं का निर्धारण सूर्य से दूरी नहीं, बल्कि पृथ्वी की धुरी के झुकाव से होता है। इसलिए सूर्य से सबसे अधिक दूरी पर होने के बावजूद उत्तरी गोलार्ध में गर्मी और दक्षिणी गोलार्ध में सर्दी बनी रहती है। यह आधुनिक खगोल विज्ञान का पूर्णतः प्रमाणित और वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य है।




