21 जून को होगा वर्ष का सबसे लंबा दिन, दोपहर 1:54 बजे घटित होगी ग्रीष्म संक्रांति
पृथ्वी के 23.5 डिग्री झुकाव का अद्भुत प्रभाव, भारत सहित उत्तरी गोलार्ध में सबसे छोटा होगा रात का समय

महराजगंज।(न्यूज पैच)। 21 जून 2026 को भारत सहित उत्तरी गोलार्ध के देशों में वर्ष का सबसे लंबा दिन और सबसे छोटी रात दर्ज की जाएगी। खगोल विज्ञान की दृष्टि से यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी दिन ग्रीष्म संक्रांति (Summer Solstice) की खगोलीय घटना घटित होगी। भारतीय समयानुसार यह विशेष क्षण दोपहर 1 बजकर 54 मिनट पर आएगा, जब सूर्य अपनी वार्षिक यात्रा में उत्तरी दिशा के सबसे ऊंचे बिंदु पर पहुंच जाएगा।
खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार ग्रीष्म संक्रांति पृथ्वी और सूर्य के बीच बनने वाली एक महत्वपूर्ण खगोलीय स्थिति है, जिसका सीधा संबंध पृथ्वी की धुरी के लगभग 23.5 डिग्री झुकाव से है। यही झुकाव पृथ्वी पर ऋतुओं के निर्माण और दिन-रात की अवधि में होने वाले बदलाव का प्रमुख कारण है।
क्या है ग्रीष्म संक्रांति?
खगोलविदों के अनुसार ग्रीष्म संक्रांति वह क्षण होता है जब सूर्य की सीधी किरणें कर्क रेखा (23.44 डिग्री उत्तर अक्षांश) पर पड़ती हैं। इस समय सूर्य पृथ्वी के भूमध्य रेखीय तल के सापेक्ष अपनी अधिकतम उत्तरी स्थिति में होता है। इसके बाद सूर्य की प्रत्यक्ष वार्षिक यात्रा पुनः दक्षिण दिशा की ओर बढ़ना शुरू कर देती है।
यही कारण है कि 21 जून के बाद उत्तरी गोलार्ध में दिन धीरे-धीरे छोटे होने लगते हैं, हालांकि गर्मी का मौसम कई सप्ताह तक बना रहता है।
पृथ्वी सूर्य के ज्यादा करीब नहीं होती
अमर पाल सिंह ने बताया कि आम धारणा है कि गर्मियों में पृथ्वी सूर्य के अधिक निकट होने के कारण तापमान बढ़ता है, जबकि वैज्ञानिक रूप से यह धारणा सही नहीं है। वास्तव में जुलाई की शुरुआत में पृथ्वी सूर्य से अपनी वार्षिक अधिकतम दूरी (एफेलियन) के निकट होती है। इसके बावजूद उत्तरी गोलार्ध में गर्मी रहती है क्योंकि पृथ्वी का उत्तरी भाग सूर्य की ओर अधिक झुका होता है।
इस कारण सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ती हैं, दिन लंबा होता है और धरती को अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है।
भारत में कितना लंबा होगा दिन?
भारत के विभिन्न हिस्सों में दिन की अवधि अलग-अलग होगी। दक्षिण भारत में दिन और रात के बीच अंतर अपेक्षाकृत कम रहेगा, जबकि उत्तर भारत में यह अंतर अधिक दिखाई देगा।
गोरखपुर, लखनऊ, वाराणसी, प्रयागराज और भोपाल जैसे क्षेत्रों में दिन लगभग 13 घंटे 40 मिनट तक रहेगा, जबकि दिल्ली और उससे उत्तर के क्षेत्रों में दिन लगभग 14 घंटे तक पहुंच सकता है।
क्या यही वर्ष का सबसे गर्म दिन होगा?
खगोलविदों के अनुसार जरूरी नहीं कि 21 जून ही वर्ष का सबसे गर्म दिन हो। सूर्य से प्राप्त अतिरिक्त ऊर्जा को पृथ्वी, महासागर और वातावरण धीरे-धीरे अवशोषित करते हैं। इसी कारण अधिकतम तापमान अक्सर जून के अंतिम सप्ताह, जुलाई या अगस्त में दर्ज किया जाता है। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया को “सीजनल लैग” कहा जाता है।
खगोल विज्ञान के लिए विशेष महत्व
ग्रीष् संक्रांति केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं बल्कि पृथ्वी की गतियों को समझने का महत्वपूर्ण अवसर भी है। इसके माध्यम से वैज्ञानिक पृथ्वी की धुरी के झुकाव, ऋतु परिवर्तन, सौर ऊर्जा वितरण, मौसम विज्ञान और जलवायु संबंधी अध्ययन करते हैं।
योग दिवस से भी जुड़ा है विशेष संबंध
संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय योग दिवस भी प्रत्येक वर्ष 21 जून को मनाया जाता है। इस तिथि का चयन इसलिए किया गया क्योंकि यह उत्तरी गोलार्ध का सबसे लंबा दिन होता है और प्राचीन सभ्यताओं में इसे ऊर्जा, प्रकाश, संतुलन और चेतना का प्रतीक माना जाता है।
आर्कटिक में नहीं होता सूर्यास्त
ग्रीष्म संक्रांति के दौरान उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर सर्वाधिक झुका होता है। इसके परिणामस्वरूप आर्कटिक क्षेत्र में सूर्य 24 घंटे तक दिखाई देता है। इस अद्भुत घटना को “मिडनाइट सन” अर्थात मध्यरात्रि सूर्य कहा जाता है।
इतिहास और संस्कृति से भी जुड़ी है संक्रांति
ग्रीष्म संक्रांति का महत्व केवल विज्ञान तक सीमित नहीं है। दुनिया की अनेक प्राचीन सभ्यताएं इसे विशेष पर्व के रूप में मनाती रही हैं। इंग्लैंड का प्रसिद्ध स्टोनहेंज स्मारक, पेरू का माचू पिचू और मेक्सिको का चिचेन इत्जा जैसे ऐतिहासिक स्थल सूर्य की इसी वार्षिक गति को ध्यान में रखकर निर्मित किए गए थे।
स्वीडन और अन्य नॉर्डिक देशों में इस दिन “मिडसमर उत्सव” मनाया जाता है, जबकि पेरू में सूर्य देवता के सम्मान में “इंटी रायमी” उत्सव आयोजित होता है।
प्रकृति के अद्भुत संतुलन का प्रतीक
खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार 21 जून 2026 की ग्रीष्म संक्रांति हमें यह समझने का अवसर देती है कि पृथ्वी की साधारण दिखाई देने वाली गति ही ऋतुओं, दिन-रात की अवधि और पूरे जलवायु तंत्र को नियंत्रित करती है।
उन्होंने कहा कि विज्ञान की दृष्टि से ग्रीष्म संक्रांति केवल वर्ष का सबसे लंबा दिन नहीं, बल्कि पृथ्वी और सूर्य के बीच चल रहे उस अद्भुत खगोलीय नृत्य का प्रमाण है, जिसने अरबों वर्षों से पृथ्वी पर जीवन की परिस्थितियों को आकार दिया है।




