23 सितंबर को होगा सितंबर विषुव, ऋतु परिवर्तन के साथ समझें पृथ्वी की खगोलीय गति
सुबह 5:35 बजे होगा विषुव का सटीक क्षण, उत्तरी गोलार्ध में शुरू होगी खगोलीय शरद ऋतु

गोरखपुर।(न्यूज पैच)। वर्ष 2026 का सितंबर विषुव (September Equinox) 23 सितंबर को भारतीय समयानुसार सुबह 5:35 बजे घटित होगा। इस दौरान सूर्य आकाशीय विषुवत् रेखा को उत्तर से दक्षिण की ओर पार करेगा। इसके साथ उत्तरी गोलार्ध में खगोलीय शरद ऋतु और दक्षिणी गोलार्ध में खगोलीय वसंत ऋतु की शुरुआत मानी जाती है। NASA के अनुसार 2026 में सितंबर विषुव का सटीक समय 00:05 UTC है, जो भारतीय समय के अनुसार 5:35 बजे बैठता है।
वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला, गोरखपुर के एस्ट्रोनॉमी एजुकेटर अमर पाल सिंह ने बताया कि विषुव किसी पूरे दिन चलने वाली घटना नहीं, बल्कि एक निश्चित खगोलीय क्षण है। इस समय सूर्य की स्थिति आकाशीय विषुवत् रेखा पर होती है। वर्ष में दो विषुव—मार्च और सितंबर—होते हैं। सितंबर विषुव के बाद उत्तरी गोलार्ध में दिन धीरे-धीरे छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं।
दिन-रात बिल्कुल 12-12 घंटे नहीं
विषुव के साथ अक्सर यह धारणा जुड़ी होती है कि इस दिन हर जगह दिन और रात ठीक 12-12 घंटे के होते हैं। वैज्ञानिक रूप से ऐसा नहीं है। सूर्य एक बिंदु नहीं बल्कि एक डिस्क है और पृथ्वी का वायुमंडल सूर्य के प्रकाश का अपवर्तन करता है। इन कारणों से अधिकांश स्थानों पर विषुव के दिन दिन की अवधि रात से थोड़ी अधिक रहती है। जिस तारीख को किसी स्थान पर दिन और रात की अवधि लगभग बराबर होती है, उसे इक्विलक्स (Equilux) कहा जाता है और इसकी तारीख स्थान के अक्षांश के अनुसार बदलती है।
सूर्य के उदय और अस्त की दिशा
विषुव के आसपास सूर्य लगभग पूर्व दिशा में उदय और पश्चिम दिशा में अस्त होता दिखाई देता है। हालांकि स्थानीय क्षितिज, पहाड़, इमारतें और अन्य भौगोलिक परिस्थितियां वास्तविक अवलोकन में अंतर पैदा कर सकती हैं। इस घटना को खुले स्थान से सूर्योदय और सूर्यास्त की दिशा चिह्नित करके आसानी से समझा जा सकता है।
ऋतुओं का कारण पृथ्वी का अक्षीय झुकाव
अमर पाल सिंह के अनुसार ऋतु परिवर्तन का मूल कारण पृथ्वी की सूर्य से दूरी में बदलाव नहीं, बल्कि पृथ्वी की धुरी का लगभग 23.5 डिग्री झुकाव और सूर्य के चारों ओर उसकी परिक्रमा है। इसी झुकाव के कारण वर्ष के अलग-अलग समय में उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध को मिलने वाली सूर्य की रोशनी तथा दिन की लंबाई में बदलाव आता है।
चार प्रमुख खगोलीय पड़ाव
एक वर्ष के मौसमी चक्र में चार प्रमुख खगोलीय घटनाएं होती हैं—मार्च विषुव, जून संक्रांति, सितंबर विषुव और दिसंबर संक्रांति। विषुव के समय सूर्य आकाशीय विषुवत् रेखा को पार करता है, जबकि संक्रांति के समय सूर्य की आभासी स्थिति आकाशीय विषुवत् रेखा से उत्तर या दक्षिण की ओर अधिकतम दूरी पर होती है।
बिना दूरबीन भी किया जा सकता है अवलोकन
विषुव को समझने के लिए किसी विशेष दूरबीन की आवश्यकता नहीं है। सूर्य के उदय-अस्त की दिशा और दिनभर किसी छड़ी या डंडे की छाया में होने वाले बदलाव का अवलोकन किया जा सकता है। इससे सूर्य की आभासी गति और पृथ्वी के घूर्णन को समझने में मदद मिलती है।
हालांकि सूर्य को सीधे नंगी आंखों से देखना सुरक्षित नहीं है। सूर्य का अवलोकन केवल प्रमाणित सोलर फिल्टर या सुरक्षित सोलर व्यूअर के माध्यम से ही किया जाना चाहिए। साधारण धूप के चश्मे या बिना प्रमाणित फिल्टर वाली दूरबीन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
क्रांतिवृत्त और विषुव बिंदु
पृथ्वी से देखने पर सूर्य तारों की पृष्ठभूमि के सामने जिस आभासी वार्षिक मार्ग पर चलता हुआ दिखाई देता है, उसे क्रांतिवृत्त कहा जाता है। क्रांतिवृत्त और आकाशीय विषुवत् रेखा के दो प्रतिच्छेदन बिंदु विषुव बिंदु कहलाते हैं।
पृथ्वी की धुरी में दीर्घकालिक परिवर्तन यानी अयन-चलन (precession) के कारण ये विषुव बिंदु तारों की पृष्ठभूमि के सापेक्ष धीरे-धीरे बदलते रहते हैं। पृथ्वी की धुरी के इस पूर्वगमन चक्र की अवधि लगभग 26,000 वर्ष मानी जाती है।
भारतीय खगोलीय परंपरा में भी महत्व
अमर पाल सिंह ने बताया कि भारतीय खगोल परंपरा में सूर्य की गति, ऋतु-चक्र, अयन और नक्षत्रों का लंबे समय से अध्ययन किया जाता रहा है। नक्षत्रों और ऋतु परिवर्तन से जुड़े आकाशीय अवलोकन का उपयोग समय-गणना, पंचांग और कृषि संबंधी गतिविधियों में भी किया जाता रहा है।
उन्होंने बताया कि 23 सितंबर 2026 का सितंबर विषुव पृथ्वी के अक्षीय झुकाव, सूर्य की आभासी गति और ऋतु परिवर्तन को समझने का महत्वपूर्ण अवसर है। यह घटना यह समझने में मदद करती है कि पृथ्वी की गति और उसकी धुरी का झुकाव हमारे दिन-रात तथा मौसमी चक्र को किस प्रकार प्रभावित करता है।




