देश की राजधानी मे चमका जनपद का सितारा, राष्ट्रपति से मिले सोहरौना राजा के डा अब्दुल कय्यूम,औषधीय पौधो व आयुर्वेद की सम्भावनाओ पर हुआ संवाद
भारतीय वन सेवा तक का किया सफर सफर अब औषधीय पौधों और आयुष क्षेत्र के लिए कर रहे हैं काम

महराजगंज।(न्यूज पैच)। उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के छोटे से गांव सोहरौना राजा में पला-बढ़ा एक लड़का जब स्कूल की पढ़ाई कर रहा था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक दिन वह देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन भारत की राष्ट्रपति से राष्ट्रपति भवन में बैठकर संवाद करेगा।
जनपद के सोहरौना राजा निवासी डॉ. अब्दुल क़य्यूम, IFS की- एक ऐसी यात्रा की, जिसमें गांव की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर शिक्षा, मेहनत, तकनीक, प्रशासन और समाज के लिए काम करने का जुनून लगातार साथ चलता रहा।
डॉ. क़य्यूम की प्रारंभिक शिक्षा गांव के माहौल में हुई। वे स्थानीय स्कूल से पढ़ाई करने के बाद जवाहर नवोदय विद्यालय गोरखपुर पहुंचे। इसके बाद उन्होंने IIT कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में B.Tech किया और फिर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली से Bioinformatics में Ph.D. की। उपलब्ध प्रोफाइल के अनुसार उनका शोध और तकनीकी कार्य भू-स्थानिक तकनीक तथा प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े विषयों पर भी केंद्रित रहा है। लेकिन यह सफर केवल डिग्रियों तक सीमित नहीं रहा।
IIT से वन तक पहुंचा तकनीक का सफर
भारतीय वन सेवा में आने के बाद डॉ. क़य्यूम ने देश के अलग-अलग भौगोलिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में काम किया। अरुणाचल प्रदेश में तैनाती के दौरान उन्होंने Remote Sensing, GIS, मोबाइल तकनीक और डेटा आधारित मॉडलिंग को वन प्रबंधन से जोड़ते हुए eForestFire पहल विकसित करने में नेतृत्व किया।
इस व्यवस्था का उद्देश्य जंगलों में आग लगने की आशंका वाले क्षेत्रों की पहचान कर प्रशासन को पहले से तैयारी करने में मदद करना था। इसमें गांव स्तर तक जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान और नागरिकों से मोबाइल ऐप के माध्यम से सूचना प्राप्त करने की व्यवस्था शामिल थी। इस पहल को National Awards for e-Governance से भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया गया।
यानी गांव से निकला वह विद्यार्थी, जिसने तकनीक की पढ़ाई की थी, उसने अपनी तकनीकी शिक्षा को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा- बल्कि उसे जल, जंगल, ज़मीन और आम लोगों की समस्याओं के समाधान में लगाने की कोशिश की।
अब औषधीय पौधों के क्षेत्र में नई जिम्मेदारी
आज डॉ. अब्दुल क़य्यूम आयुष मंत्रालय के National Medicinal Plants Board (NMPB) में Director (Technical) एवं Deputy CEO के रूप में कार्य कर रहे हैं। NMPB देश में औषधीय पौधों के संरक्षण, खेती, व्यापार, नीतिगत सहयोग और कार्यक्रमों से जुड़े कार्यों का समन्वय करता है।
उनका वर्तमान काम उस क्षेत्र से जुड़ा है जिसका संबंध सीधे गांवों, किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से है।
भारत में औषधीय पौधे केवल आयुर्वेद या पारंपरिक चिकित्सा का हिस्सा नहीं हैं। इनके माध्यम से किसानों के लिए नई फसलें, ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन के अवसर और स्थानीय जैव-विविधता के संरक्षण की संभावनाएं भी जुड़ी हैं।
यही कारण है कि डॉ. क़य्यूम के लिए औषधीय पौधों का विषय केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ज्ञान, स्वास्थ्य, पर्यावरण और ग्रामीण आजीविका को जोड़ने का अवसर भी है।
और फिर आया वह यादगार क्षण…
इसी यात्रा के दौरान हाल ही में उन्हें राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में भारत की माननीय राष्ट्रपति से भेंट एवं संवाद का अवसर मिला।
इस अवसर पर आयुष क्षेत्र की बढ़ती स्वीकार्यता और मांग तथा एक व्यापक एवं समग्र स्वास्थ्य इको सिस्टम के रूप में आयुष की संभावनाओं पर चर्चा हुई। विशेष रूप से राष्ट्रीय स्तर के Herbal Gardens के माध्यम से औषधीय पौधों के संरक्षण, संवर्धन, जन-जागरूकता और ज्ञान के प्रसार की संभावनाओं पर भी विचार-विमर्श हुआ।
इस अवसर पर माननीय केंद्रीय आयुष मंत्री श्री प्रताप राव जाधव जी एवं प्रो. (डॉ.) महेश कुमार दाधीच, CEO, NMPB भी उपस्थित रहे।
एक गांव के बच्चे के लिए इससे बड़ी प्रेरणा क्या हो सकती है?
सोहरौना राजा जैसे गांव से निकलकर राष्ट्रपति भवन तक पहुंचना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि की कहानी नहीं है।
यह उस भारत की कहानी है जहां गांव का बच्चा ग्रामीण स्कूलों से पढ़कर नवोदय विद्यालय तक पहुंच सकता है, IIT में पढ़ सकता है, JNU में शोध कर सकता है, भारतीय वन सेवा में प्रवेश कर सकता है और देश के सर्वोच्च संस्थानों में नीति और विकास के मुद्दों पर अपनी बात रख सकता है।
डॉ. क़य्यूम की यात्रा यह भी बताती है कि साधारण शुरुआत किसी व्यक्ति की मंजिल तय नहीं करती।
मंजिल तय करते हैं- शिक्षा, मेहनत, अवसर और समाज के लिए कुछ करने की इच्छा।
आज जब वे औषधीय पौधों के संरक्षण और उनके माध्यम से किसानों तथा ग्रामीण समुदायों के लिए नए अवसर तलाशने की दिशा में काम कर रहे हैं, तो उनकी अपनी यात्रा भी कहीं न कहीं उसी संदेश को दोहराती है-
“गांव से निकलने वाला सपना, अगर शिक्षा और मेहनत का साथ पा जाए, तो उसकी पहुंच राष्ट्रपति भवन तक भी हो सकती है।”
सोहरौना राजा से राष्ट्रपति भवन तक यह केवल डॉ. अब्दुल क़य्यूम की कहानी नहीं, बल्कि छोटे गांवों के उन लाखों बच्चों के सपनों की कहानी है जो बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं।




